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Showing posts from February, 2026
विवाह पूर्व प्रेम पाप है  तो विवाह के बाद प्रेम पुण्य कैसे हो सकता है? #ओशो✍️ ओशो के कथन की निम्नलिखित व्याख्या गूगल सर्च में देखी जा सकती है: ओशो द्वारा लिखित "संभोग से समाधि" का केंद्रीय अर्थ काम-ऊर्जा का दमन करने के बजाय, उसे जागरूकता और प्रेम के माध्यम से उच्चतर ऊर्जा यानी ध्यान व समाधि में रूपांतरित करना है। ओशो के अनुसार काम से राम (परमात्मा) की ओर एक यात्रा है, जहाँ संभोग को पहला सोपान मानकर ध्यान के माध्यम से सर्वोच्च आनंद का अनुभव पाया जाता है।  ओशो के इस विचार के मुख्य बिंदु इस प्रकार हैं: रूपांतरण न कि दमन: ओशो ने संभोग को दबाने की जगह उसे समझने पर जोर दिया। उनका मानना था कि यौन ऊर्जा ही आध्यात्मिक ऊर्जा है, जिसे ऊपर उठाया जा सकता है। जागरूकता: संभोग की स्थिति में जब व्यक्ति स्वयं को भूल जाता है और पूर्णतः वर्तमान में होता है, वह एक क्षणिक समाधि जैसा ही अनुभव है। अगर इसे होश (Awareness) के साथ किया जाए, तो यह ध्यान का द्वार बन सकता है। प्रेम का सेतु: संभोग से समाधि तक पहुंचने के लिए प्रेम एक सेतु (Bridge) का काम करता है, जो वासना को पवित्रता में बदलता है। काम से मु...

स्वतंत्रता आवश्यक है, लेकिन

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  स्वतंत्रता आवश्यक है, लेकिन इसे नियंत्रण से बाहर न जाने देने के लिए अनुशासन के साथ संचालित किया जाना चाहिए। #nirajchitravanshi✍️  स्वतंत्रता एक दोधारी तलवार है - यह विकास और खुशी के लिए आवश्यक है, लेकिन यदि इसे जिम्मेदारी से नहीं संभाला जाए तो यह अराजकता की ओर भी ले जा सकती है। यही पर अनुशासन आता है - यह वह ढांचा है जो हमारी स्वतंत्रता को अराजकता में नहीं बदलने देता। एक कार 🚗 चलाने जैसा सोचें। स्वतंत्रता गाड़ी की चाबी है, लेकिन अनुशासन यातायात नियमों का पालन करना है। आपको अपने गंतव्य तक सुरक्षित पहुँचने के लिए दोनों की आवश्यकता है! "Freedom is necessary but must be operated with Decipline to don't let go out of the control." #nirajchitravandhi✍️ Freedom is a double-edged sword - it's essential for growth and happiness, but it can also lead to chaos if not handled responsibly. That's where discipline comes in – it's the framework that ensures our freedom doesn't turn into anarchy. *Think of it like driving a car 🚗. Freedom is having the keys, but discip...

भौतिक वृद्धि और आध्यात्मिक समृद्धि

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  भौतिक वृद्धि और आध्यात्मिक समृद्धि दोनों दो अलग दुनियां है भौतिक वृद्धि की लालसा जितनी गहरी होगी आध्यात्मिक समृद्धि का उतना ही पतन होता जाएगा। #nirajchitravandhi✍️  भौतिक वृद्धि और आध्यात्मिक समृद्धि वास्तव में दो अलग-अलग पहलू हैं जो अक्सर एक दूसरे के विपरीत दिशा में चलते हैं। भौतिक वृद्धि की लालसा हमें बाहरी दुनिया में ले जाती है, जहां हम अधिक से अधिक हासिल करने की कोशिश करते हैं, जबकि आध्यात्मिक समृद्धि हमें अपने अंदर की ओर ले जाती है, जहां हम अपने असली स्वरूप को समझने की कोशिश करते हैं। भौतिक वृद्धि की लालसा जितनी गहरी होगी, आध्यात्मिक समृद्धि का उतना ही पतन होता जाएगा, हम भौतिक चीजों में उलझ जाते हैं, तो हम अपने आध्यात्मिक पहलू को नजरअंदाज कर देते हैं, जिससे हमारा आध्यात्मिक पतन होता है। आगे हम इस विषय पर भी बात करेंगे कि कैसे हम भौतिक वृद्धि और आध्यात्मिक समृद्धि के बीच संतुलन बना सकते हैं? Material growth and spiritual prosperity are two different worlds. The deeper the desire for material growth, the more the spiritual prosperity will decline. #nirajchitravanshi✍️ ...