विवाह पूर्व प्रेम पाप है
तो विवाह के बाद प्रेम पुण्य कैसे हो सकता है?
#ओशो✍️
ओशो के कथन की निम्नलिखित व्याख्या गूगल सर्च में देखी जा सकती है:
ओशो द्वारा लिखित "संभोग से समाधि" का केंद्रीय अर्थ काम-ऊर्जा का दमन करने के बजाय, उसे जागरूकता और प्रेम के माध्यम से उच्चतर ऊर्जा यानी ध्यान व समाधि में रूपांतरित करना है। ओशो के अनुसार काम से राम (परमात्मा) की ओर एक यात्रा है, जहाँ संभोग को पहला सोपान मानकर ध्यान के माध्यम से सर्वोच्च आनंद का अनुभव पाया जाता है।
ओशो के इस विचार के मुख्य बिंदु इस प्रकार हैं:
रूपांतरण न कि दमन: ओशो ने संभोग को दबाने की जगह उसे समझने पर जोर दिया। उनका मानना था कि यौन ऊर्जा ही आध्यात्मिक ऊर्जा है, जिसे ऊपर उठाया जा सकता है।
जागरूकता: संभोग की स्थिति में जब व्यक्ति स्वयं को भूल जाता है और पूर्णतः वर्तमान में होता है, वह एक क्षणिक समाधि जैसा ही अनुभव है। अगर इसे होश (Awareness) के साथ किया जाए, तो यह ध्यान का द्वार बन सकता है।
प्रेम का सेतु: संभोग से समाधि तक पहुंचने के लिए प्रेम एक सेतु (Bridge) का काम करता है, जो वासना को पवित्रता में बदलता है।
काम से मुक्त: जब व्यक्ति को समाधि का अनुभव हो जाता है, तो उसे संभोग के द्वारा मिलने वाली क्षणिक तृप्ति की आवश्यकता नहीं रहती, और वह काम के बंधन से मुक्त हो जाता है।
संक्षेप में, यह दृष्टिकोण कामुकता से ऊपर उठकर चेतना के उच्च स्तर पर पहुंचने की एक सूत्र पर आधारित प्रक्रिया है।
उक्त कथन में जिस प्रेम की बात ओशो द्वारा की जा रही है
वह प्रेम बिना विवाह के पशुता है
विवाह के उपरांत प्रेम सभ्य समाज की व्यवस्था है।
समाज की आदर्श व्यवस्था के विपरीत जीने के लिए
जंगल में जाओ वहां पशुओं की तरह स्वतंत्रता जीओ।
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