हे! राजनीति के धुरंधरों*:*रहम करो

हम भारतीय एक रहेंगे तो नेक रहेंगे -प्रो अखिलेश्वर शुक्ला।                   

जौनपुर ।  77वें गणतंत्र दिवस को हम सभी भारतीय हर्षोल्लास के साथ मना रहे हैं वहीं ब्रिटिश संसद द्वारा पारित "भारतीय शासन अधिनियम 1935" के मूल ढांचे पर आधारित संविधान सभा के 229 निर्वाचित एवं 70 मनोनीत सदस्यों , 22 समितियों के गहन चिंतन मनन, वाद - विवाद एवं अनेक देशों के भ्रमण व अध्ययन के पश्चात "भारत का संविधान" निर्मित एवं अंगीकृत किया गया। जिसमें अब तक कुल *106 संसोधनों* का सामना करना पड़ा है। जिसके पक्ष में यह तर्क दिया जाता है कि समय के साथ बदलाव जरूरी है। लेकिन हम सभी कब बदलेंगे? हम जहां कहीं भी पारिवारिक या सामाजिक समस्या आती है तो तुरंत विकास एवं आधुनिकीकरण की दुहाई देते हैं और सोंच बदलने की बात करते हैं। लेकिन राजनीतिक दलों और नेताओं को भारतीय समाज को जोड़ने वाली प्राथमिकताओं के बजाय तोड़ने वाली ब्यवस्थाऐं ज्यादा रास आती हैं।  अपने पसंदीदा नारों (श्लोगन) के बल पर जन सामान्य को रिक्षानें की कला के माहिर यह जानते हैं कि भारतीय जनता को केवल भर पेट खाने एवं सोने को मिलता रहे , हांथ में मोबाइल हो, तो शिक्षा, स्वास्थ्य, सुरक्षा की समस्या से निजात मिल जाएगी। यह लक्ष्य *"सबका साथ सबका विकास* से पूर्ण हो चुका है।  स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद से देश की जनता ऐसे ही लोक लुभावन नारों को लेकर राजनीतिक दलों को समर्थन एवं सता प्रदान करती रही है । 



 *भारतीय संविधान में वर्णित  मौलिक अधिकार के अनुच्छेद -14से 18  में समानता के अधिकार की बात* जो की गई है उसके मूल उद्देश्य को समक्षने का प्रयास किया जाए तो स्पष्ट रूप से कहा जा सकता है कि - *समाज में किसी को भी कानून के समक्ष समानता एवं अवसर की समानता से वंचित नहीं किया जा सकता है। यही नहीं भेद- भाव के निषेध की भी बात कही गई है।* हां ! यह जरुर कहा जा सकता है कि 1947 में भारतीय अर्थव्यवस्था औपनिवेशिक शोषण के कारण बेहद पिछड़ा हुआ, गतिहीन था।  75% आबादी कृषि पर निर्भर थी। बुनियादी ढांचा ब्रिटिश निर्यात के प‌क्ष में था। *भारतीय जातिगत ब्यवस्था में पिछड़े वर्ग को आगे बढ़ाने की आवश्यकता थी। बाबा साहेब भीमराव अंबेडकर ने भी नहीं सोचा होगा कि - इस पिछड़े वर्ग को आगे बढ़ाने के बजाय सतासुख प्राप्ति के साधन के रूप में प्रयोग किया जाता रहेगा।*                                    

 वास्तव में आज देश के महत्वपूर्ण पदों पर पिछणी जातियों का होना गौरव की बात है। लेकिन सामाजिक कटुता, दुराव, मनमुटाव को बढ़ावा देने वाले नियम कानून लागू करने से  न रोजगार सृजन होगा, न सामाजिक समरसता, समानता कायम होगी, हां! इतना जरूर होगा कि -छल, कपट, प्रपंच वाले राजनीति के धुरंधरों के लिए सतासुख प्राप्ति का मजबूत आधार बना रहेगा।       


  राजनीतिक महत्वाकांक्षा ने आज समाज को खंड खंड करके, संयुक्त परिवार से लेकर सामाजिक, व्यापारिक गतिविधियों को अस्त व्यस्त करने का काम किया है। 

जहां राष्ट धर्म की बात होनी चाहिए। वहीं धर्म पर भी राजनीतिक प्रभाव की युक्ति में राजनेता मशगूल हैं।                        

  वर्तमान में भारत दुनिया की चौथी अर्थव्यवस्था है तो केवल भारतीय बौद्धिक संपदा, ज्ञान -विज्ञान, पूर्वजों के संस्कार एवं *अनेकता में एकता* के कारण है। जिसे बनाए रखने के लिए आपसी सौहार्द को क्षतिग्रस्त करने वाले, समाज को तोड़ने वाले तमाम ब्यवस्था का सामुहिक विरोध करना होगा।         

  हां! यह भी जरूरी है कि समाज में जो भी कमजोर है, आर्थिक तंगी का सामना कर रहा है। उसके तरक्की विकास के दीशा में हमें सामाजिक सौहार्द के साथ प्रयास करना होगा।          

  दोहरे मापदंड के शिकार, समान आचार संहिता लागू करने की बात करने वाले लोग यदि समाज में विद्वेषमूलक कार्य करने वाले लोगों को प्रश्रय मिलता रहा तो हमारी संतति हमें सदैव कोसती रहेगी।  

भारतीय सामाजिक, सांस्कृतिक, राष्ट्रीय एकता की जय हो --जय हिन्द जय भारत 🚩 🌹।                                   

 प्रोफेसर ( कैप्टन) डॉ अखिलेश्वर शुक्ला-पूर्व प्राचार्य/ विभागाध्यक्ष, राजनीति विज्ञान,;राजा श्री कृष्ण दत्त स्नातकोत्तर महाविद्यालय -जौनपुर (उत्तर प्रदेश)

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