ईश्वरीय वृत्ति से एकाकार होता
निरंतर सम्पूर्ण का अध्ययन एक ऐसी प्रक्रिया है जो अंत तक पहुचकर अपने प्रांरभ आध्यात्म की ओर मुड़ जाती है, जब भौतिक सब पढ़ ही लिया, तो बचा ही क्या? अब इसी पड़ाव पर अध्ययन को एक डाइवर्जन चाहिए अन्यथा अब जिज्ञासा शेष की ओर भागेगी। जिसे बचपन से ही पढ़ाया नहीं गया, जिज्ञासा तो उसी शेष की ओर भागने लगती है और जो भी आध्यात्म की इस धारा में बह जाता है उसके बारे में बहोत संभव है, कि वह संयस्थ हो जाय, क्योंकि जीवन के इस पड़ाव पर आकर भौतिक संसार की सभी वस्तुओं से मोह भंग होने लगता है, और कभी भी अनुभव में न आने वाली अद्भुद शांति और सुकून से परिचय होता है जहां ईश्वरीय वृत्ति से एकाकार होता है फिर ऐसा व्यक्ति परमानंद को प्राप्त कर पुनः संसार की ओर वापस नहीं आता।
संयस्थ होने का आशय सबकुछ त्यागने से नहीं अपितु सत्य,नैतिक, आदर्श आदि व नैसर्गिकता के योग में रहना है, जिसका वेश भूषा इत्यादि से बस प्रारम्भिक पहचान मात्र है। वास्तविकता तो भीतर की स्थिति है।
अनंत शुभकामनाएं



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